लगभग दो दशकों तक मेरा जीवन होम्योपैथिक संस्थाओं की बैठकों, चर्चाओं और मंचों के बीच सक्रिय रूप से चलता रहा – केवल दर्शक की तरह नहीं, बल्कि एक सहभागी की तरह। ये बैठकें हमेशा किसी बड़े सभागार में नहीं होती थीं। कई बार वे काम के बाद किसी क्लिनिक में होतीं, कभी किसी वरिष्ठ के निवास पर, जहां कुर्सियां पास खिसक जातीं, चाय चुपचाप आ जाती, और ज्ञान का आदान-प्रदान बिना किसी दिखावे के हो जाता।
उन वर्षों के अनेक चेहरे और नाम मेरी स्मृति में बसे हैं – डॉ. एम. एल. अग्रवाल, डॉ. जे. पी. एस. बक्शी, डॉ. जुगल किशोर, डॉ. दीवान हरिश चंद, डॉ. डी. पी. रस्तोगी, डॉ. आर. के. मनचंदा, डॉ. एस. पी. एस. बक्शी, डॉ. ए. के. सेठ, डॉ. आर. एन. वाही, डॉ. वी. पी. गुप्ता, डॉ. अनुराधा, डॉ. आदित्य कौशिक, डॉ. गिरेंद्र पाल (जयपुर) – और भी अनेक, जिनके साथ बिताया समय आज भी किसी शांत धागे की तरह जुड़ा हुआ है, भले ही तारीखें धुंधली पड़ गई हों।
मुझे उन वर्षों में जो बात सबसे अधिक प्रभावित करती थी, वह यह कि संस्थाएं अलग-अलग होने के बावजूद, सहभागिता की सीमाएं सख्त नहीं थीं। लगभग हर वरिष्ठ के पास अपनी संस्था, अपना मंच, अपना वृत्त था। फिर भी वही लोग अन्य संस्थाओं में भी सक्रिय रहते थे। कोई एक संगठन में अतिथि होता, दूसरे में वक्ता, तीसरे में सलाहकार, और चौथे में साधारण श्रोता। अच्छे समय में व्यवस्था porous “छिद्रदार” थी – ज्ञान चलता था, विचार एक मेज से दूसरी मेज तक पहुंचते थे, बिना किसी पासपोर्ट के, बिना किसी अनुमति-पत्र के।
मैंने जहां भी आवश्यकता हुई, अपनी भूमिका निभाई। कभी वह दृश्य कार्य था – स्मारिका में लेखन, किसी कार्यक्रम के लिए सामग्री तैयार करना, मंच पर पेपर प्रस्तुत करना, मासिक बैठकों में बोलना। और कभी वह अदृश्य कार्य था – लोगों को जोड़ना, वरिष्ठ से विद्यार्थी का परिचय कराना, पुल बनाना, या सिर्फ ईमानदारी से उपस्थित रहना।
संस्थाएं नारे से नहीं चलतीं; वे उन लोगों के साधारण परिश्रम से चलती हैं जो बिना शोर किए दीपक जलाए रखते हैं।
मेरा बहु-संगठनात्मक जुड़ाव 1989 से आरंभ हुआ और लगभग 2010 तक बहुत सक्रिय रहा। उसके बाद जीवन का केंद्र धीरे-धीरे बदल गया। मरीजों की अपेक्षाएं, क्लिनिक की जिम्मेदारी, और साथ-साथ कॉलेजों में विजिटिंग फैकल्टी के रूप में शिक्षण-कार्य – इन सबने मेरे समय और ऊर्जा का बड़ा हिस्सा मांगना शुरू किया। मैंने संस्थाओं की दुनिया छोड़ी नहीं, पर नियमितता से हटकर चयनात्मक सहभागिता की ओर बढ़ गया। मुझे लगा था कि सद्भावना, समय की कमी से समाप्त नहीं होती।
फिर एक घटना हुई जिसने मुझे यह सब नए दृष्टिकोण से देखने को विवश कर दिया।
एक वेबिनार, जिसे मैं देने के लिए तैयार था, उसकी अनुमति नहीं दी गई। कारण विषय-वस्तु, गुणवत्ता या उपयोगिता नहीं था, बल्कि यह था कि मेरा जुड़ाव किसी दूसरी संस्था से है। एक वाक्य में वर्षों की सहभागिता को एक “लेबल” में समेट दिया गया। यह लेबल मेरे विचारों पर नहीं, मेरे संबंधों पर आधारित था। यह academic मतभेद की भाषा नहीं थी, बल्कि दूरी बनाने की भाषा थी।
ऐसे क्षणों का बोझ केवल “इंकार” में नहीं होता। कोई भी संस्था अपने कार्यक्रम तय करने के लिए स्वतंत्र है। बोझ उस संकेत में होता है जो इंकार के भीतर छिपा रहता है – कि अब व्यक्ति का मूल्यांकन उसके काम से नहीं, उसके कथित “साथ” से होगा। यह पेशेवर वातावरण को जनजातीय वातावरण में बदल देता है। यह सीखने को “खेमों” में बांट देता है।
उस समय मुझे बहस करने की आवश्यकता नहीं लगी। मुझे समझने की आवश्यकता लगी – व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि उस समग्र प्रक्रिया को ।
दिल्ली-एनसीआर में और पूरे भारत में, होम्योपैथिक संस्थाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। कई संस्थाएं सचमुच उत्साह से जन्म लेती हैं, कुछ मौजूदा ढांचों से असंतोष के कारण, और कुछ शिक्षा का नया मंच बनाने की इच्छा से। पर इस “मशरूमिंग” के साथ एक और चीज भी बढ़ती है – स्वयं को घोषित करने की बेचैनी, अपना ढोल बजाने की प्रवृत्ति, अपना क्षेत्र बचाने का आग्रह, और “हम – वे” की भाषा। जब यह बढ़ती है, तब वही संस्थाएं, जिनका घोषित मिशन समान है, व्यवहार में प्रतिद्वंद्वी की तरह खड़ी होने लगती हैं।
यहीं “राइवल” rival शब्द एक उपचारक पेशे में अजीब लगने लगता है।
प्रतिस्पर्धा बाज़ार और ट्रॉफियों की भाषा है। मिशन सेवा की भाषा है। जब मिशन एक हो, तब प्रतिद्वंद्विता उद्देश्य को गलत समझने का परिणाम बन जाती है।
पास में कोई दूसरी क्लिनिक खुल जाए, तो वह शत्रु नहीं होती। वह भी एक द्वार है जहां किसी पीड़ा को राहत मिल सकती है। मरीज केवल बोर्ड या दूरी देखकर नहीं आता; वह भरोसे, व्यवहार, सुनने की क्षमता, निरंतरता और परिणामों के कारण जुड़ता है। कोई दूसरा अच्छा काम करे, तो समाज का लाभ होता है। कोई कमजोर काम करे, तो समय उसका उत्तर दे देता है। हर स्थिति में कटुता आवश्यक नहीं – गरिमा और स्थिरता पर्याप्त हैं।
यही सिद्धांत संस्थाओं पर भी लागू होता है। यदि उद्देश्य शिक्षा, सेवा, शोध और व्यवस्था का हित है, तो दो संस्थाएं एक-दूसरे को “राइवल” दुकानों की तरह नहीं देख सकतीं। उन्हें समान कार्य में समानांतर हाथ बनकर काम करना चाहिए। जब ऐसा नहीं होता, तो समझ में आता है कि संस्कृति के भीतर कहीं न कहीं केंद्र बदल गया है। मिशन बाहर एक बैनर बन जाता है, और भीतर का मिशन नियंत्रण बन जाता है – मंचों पर नियंत्रण, कथा पर नियंत्रण, और इस बात पर नियंत्रण कि कौन “स्वीकार्य” है और कौन “अस्वीकार्य”।
मैंने जीवन के विभिन्न चरणों में इस प्रतिद्वंद्विता की परछाईं देखी है। स्कूल में यह तुलना, कॉपियों का बचाव, और साझा न करने की प्रवृत्ति में दिखती है। वयस्कता में यही भावना अधिक सुघड़ रूप में आती है – लेबल, खेमे, फुसफुसाहटें, और किसी व्यक्ति को उसके कर्म से नहीं, उसके “संबंध” से सकारात्मक या नकारात्मक ठहराने की आदत। पर गहराई से देखें तो प्रतिद्वंद्विता अक्सर दूसरे के कारण नहीं होती; वह अपने भीतर की असुरक्षा का रूप होती है – यह मान लेना कि सम्मान, पहचान, अवसर या “जगह” सीमित है।
पर सार्थक काम सीमाओं की इस भाषा को नहीं मानता।
ज्ञान गंदा नहीं होता क्योंकि वह कहां पड़ा है। फुटपाथ पर पड़ी पुस्तक भी ज्ञान ही देती है। वर्षों से धूल लगी अलमारी में रखा ग्रंथ भी सत्य ही रखता है। छोटे कमरे में बोला गया विचार, सजाए हुए मंच पर बोले गए विचार से कम नहीं हो जाता। मंच बदलते हैं, पोस्टर बदलते हैं, बैनर बदलते हैं – ज्ञान अपना स्वरूप नहीं बदलता।
इसीलिए “शुद्धता” के नाम पर दरवाज़े बंद करना मुझे विचलित करता है। इसलिए नहीं कि हर दरवाज़ा मेरे लिए खुला रहे, बल्कि इसलिए कि यह आदत समुदाय को छोटा करती है। यह युवाओं को खेमों में सोचने का प्रशिक्षण देती है। यह उन्हें सिखाती है कि सीखना ईमानदारी से नहीं, अनुमति से तय होगा। यह संकेत देती है कि बुद्धि और विवेक संस्थाओं की संपत्ति हैं, व्यक्ति की साधना नहीं।
मेरी बात, विशेषकर युवा साथियों से है।
अपने मन को प्रतिद्वंद्वी खोजने की आदत मत दीजिए। उसे अर्थ और उद्देश्य खोजने की आदत दीजिए। अपने मूल्यांकन का पैमाना दूसरे की तुलना नहीं, अपने कर्तव्य और गुणवत्ता को बनाइए। अपना मार्ग चुनिए, शांत भाव से चलिए, और उदार बने रहिए। दूसरे कर्मी का सम्मान कीजिए, भले ही उसकी पद्धति अलग हो। किसी को केवल “संबंध” के आधार पर अस्वीकार्य ठहराने के प्रलोभन से बचिए। ऐसे लेबल हृदय को सिकोड़ते हैं – और सिकुड़ा हुआ हृदय किसी बड़े मिशन को नहीं उठा सकता।
मिशन युद्धभूमि नहीं है – वह जिम्मेदारी है। जब यह दृष्टि स्थिर हो जाती है, तब प्रतिद्वंद्विता का प्रश्न ही नहीं उठता। तब केवल काम बचता है – और उसे ठीक से करने के लिए अनेक हाथों की आवश्यकता होती है।
मिशन खेमों से ऊपर है।