कल रविवार की एक शांत शाम थी। मैं खाली था और आराम से टेलीविजन के सामने बैठा था। एक चैनल से दूसरे चैनल पर जाता हुआ मैं बस यूँ ही चर्चाएँ सुन रहा था। स्वतंत्रता दिवस अभी-अभी बीता था और लगभग हर समाचार चैनल पर प्रधानमंत्री के लाल किले से दिए गए भाषण की कोई न कोई बात चर्चा में थी। उन्हीं चर्चाओं के बीच एक नया-सा शब्द बार-बार सुनाई दे रहा था – “दिमागी नक्सल।” अलग-अलग लोग उसका अलग अर्थ बता रहे थे, लेकिन मेरा मन उस बहस में नहीं अटका। न जाने क्यों, वे दो शब्द मुझे बहुत पीछे ले गए।
लगभग तीस साल पीछे।
करीब 1996 की बात है। उन दिनों मैं रिपर्टरी के Mind chapter पर काम कर रहा था। शब्दों को समझना मेरे लिए केवल उनका अर्थ जानना नहीं था। रिपर्टरी में कई बार दो मिलते-जुलते शब्दों के बीच का छोटा-सा फर्क भी किसी rubric को समझने का तरीका बदल सकता था। उन्हीं दिनों मुझे प्रोफेसर डॉ. बी. के. कालिया के साथ बैठकर भाषा और शब्दों पर चर्चा करने का अवसर मिलता था। वे अंग्रेजी विभाग के प्रमुख थे और भाषा को देखने का उनका तरीका मेरे लिए बहुत रोचक था।
वे Shorter Oxford English Dictionary खोलते और किसी शब्द की कहानी बताते। कभी यह दिखाते कि वह शब्द या उसका कोई खास अर्थ पहली बार कहाँ लिखा गया था, किस लेखक ने लिखा था, किस पुस्तक या साहित्य में आया था, और किस साल उसका प्रयोग दर्ज हुआ था। मुझे यह बात बहुत आकर्षित करती थी। जो शब्द आज हमें बिल्कुल सामान्य लगता है, कभी वह भी नया रहा होगा। किसी ने पहली बार उसे लिखा होगा, किसी और ने उसे अपनाया होगा, फिर धीरे-धीरे वह लोगों की भाषा का हिस्सा बन गया होगा।
कल उस रविवार की शाम, टीवी पर एक नए वाक्यांश की चर्चा सुनते हुए, प्रोफेसर कालिया के साथ वे पुरानी बातें अचानक फिर से याद आ गईं। जैसे सामने वही पुराना शब्दकोश खुला हो और मैं फिर से किसी शब्द की यात्रा देख रहा हूँ। तीस साल बीत चुके थे, लेकिन सवाल वही था – कोई नया शब्द या वाक्यांश हमारी भाषा में कैसे आता है, और क्यों कुछ शब्द कुछ समय बाद गायब हो जाते हैं जबकि कुछ हमारी भाषा में हमेशा के लिए जगह बना लेते हैं?
सोचते-सोचते मेरा मन और पीछे चला गया। शायद जब से मनुष्य ने बोलना सीखा, तभी से यह क्रम शुरू हो गया था। कोई चीज देखी गई, कोई अनुभव हुआ, कोई डर महसूस हुआ, कोई व्यवहार बार-बार दिखाई दिया, और फिर किसी ने उसके लिए एक नाम ढूँढ लिया। नाम मिलते ही उस अनुभव को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाना आसान हो गया। धीरे-धीरे एक अनुभव शब्द बना और वही शब्द सामूहिक याद का हिस्सा बन गया।
चिकित्सा में इसके बहुत सुंदर उदाहरण मिलते हैं। आधुनिक जाँच, स्कैन और लैब टेस्ट आने से बहुत पहले डॉक्टर अपने मरीजों को ध्यान से देखते थे। वे देखते कि कुछ लक्षण बार-बार एक साथ दिखाई दे रहे हैं। शुरुआत में वे अलग-अलग तकलीफें लगती थीं, लेकिन धीरे-धीरे किसी चिकित्सक ने उनमें एक खास pattern पहचाना। फिर उस pattern का वर्णन हुआ, उस पर चर्चा हुई, उसे पढ़ाया गया और आखिर उसे एक नाम मिला।
जेम्स पार्किन्सन से बहुत पहले भी ऐसे मरीज रहे होंगे जिनमें कंपकंपी, चलने में धीमापन और शरीर की गति में बदलाव दिखाई देते थे। बाद में इन लक्षणों के एक खास pattern को समझा गया और आज हम उसे Parkinson’s disease के नाम से जानते हैं। इसी तरह Alois Alzheimer से पहले भी ऐसे लोग रहे होंगे जिनकी याददाश्त धीरे-धीरे कम होती थी और व्यवहार तथा सोच में बदलाव आते थे। बीमारी नाम मिलने से पैदा नहीं हुई थी। वह पहले से थी, नाम ने केवल उसे पहचानने और समझाने में आसानी कर दी।
शरीर रचना में भी यही कहानी दिखाई देती है। मानव मस्तिष्क के नीचे धमनियों का एक खास घेरा हजारों साल से मौजूद था, लेकिन बाद में चिकित्साशास्त्र के विद्यार्थियों ने उसे Circle of Willis के नाम से पढ़ना शुरू किया। वह घेरा Thomas Willis के समय पैदा नहीं हुआ था। वह पहले से था, लेकिन किसी व्यक्ति के स्पष्ट वर्णन ने उसे पहचान और नाम दे दिया। हमारे शरीर के कई हिस्सों के नाम ऐसे ही उन लोगों से जुड़े हैं जिन्होंने उन्हें समझने या समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
फिर मेरा ध्यान हैनिमैन की ओर गया। Vital force और vital principle जैसे शब्द होम्योपैथी की सोच से इतने गहराई से जुड़े हैं कि कोई होम्योपैथिक चिकित्सक इन्हें सुनते ही एक खास विचार की दुनिया में पहुँच जाता है। ये शब्द हैनिमैन से पहले भी किसी न किसी रूप में मौजूद थे, लेकिन उनके विचारों में इन शब्दों को एक खास जगह और अर्थ मिला। इससे भी आगे, Homoeopathy शब्द ने एक नए चिकित्सा-पद्धति को पहचान दी और फिर वह शब्द दुनिया की अनेक भाषाओं में फैल गया।
इससे मुझे लगा कि कई बार लोग किसी चीज को बनाते नहीं हैं, वे केवल उसे पहचानने के लिए सही शब्द देते हैं। कोई विचार समाज में पहले से बिखरा हुआ हो सकता है, लेकिन जैसे ही उसके लिए एक साफ और याद रहने वाला शब्द मिल जाता है, वही विचार लोगों को अधिक स्पष्ट दिखने लगता है।
इतिहास और साहित्य में भी यही बात बार-बार दिखाई देती है।
एक जहाज था – Titanic। वह सौ साल से भी पहले समुद्र में डूब गया, लेकिन उसकी कहानी केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं रही। धीरे-धीरे उसका नाम एक प्रतीक बन गया। आज अगर कोई किसी संस्था, योजना या स्थिति को “डूबता हुआ Titanic” कह दे, तो बात केवल जहाज की नहीं होती। उसका अर्थ किसी बड़ी चीज के धीरे-धीरे संकट में जाने से जुड़ जाता है।
साहित्य ने भी कई शब्दों और वाक्यांशों को नया जीवन दिया। George Orwell के उपन्यास में Big Brother एक खास पात्र और व्यवस्था का हिस्सा था, लेकिन बाद में यह वाक्यांश निगरानी और अत्यधिक नियंत्रण के अर्थ में इस्तेमाल होने लगा। Joseph Heller के Catch-22 ने ऐसी परिस्थिति के लिए एक छोटा और याद रहने वाला नाम दे दिया, जिसमें आदमी किसी भी रास्ते से निकले, फिर भी उलझन से बाहर न निकल पाए।
Godfather शब्द भी बहुत पुराना था और उसका मूल अर्थ बिल्कुल अलग था। लेकिन Mario Puzo के उपन्यास और बाद में बनी फिल्म ने इस शब्द को एक नई पहचान दे दी। धीरे-धीरे यह केवल एक पात्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसी क्षेत्र के बहुत प्रभावशाली, वरिष्ठ या शुरुआत करने वाले व्यक्ति के लिए भी इस्तेमाल होने लगा। पुराना शब्द वही था, लेकिन समय ने उसके भीतर नया अर्थ जोड़ दिया।
राजनीतिक भाषा में भी ऐसा होता रहा है। Fake news शब्द Donald Trump से बहुत पहले मौजूद था, लेकिन उनके बार-बार इस्तेमाल से यह पूरे संसार में चर्चा का हिस्सा बन गया। दो सामान्य शब्द अचानक एक नई ताकत के साथ लोगों की जुबान पर आ गए। लोग उसके अर्थ से सहमत हों या असहमत, यह अलग बात है, लेकिन भाषा की दृष्टि से यह देखना रोचक है कि किसी पुराने वाक्यांश को भी कोई नया समय नई ऊर्जा दे सकता है।
और फिर आया 15 अगस्त 2026।
लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “दिमागी नक्सल” शब्द का प्रयोग किया। अगले ही दिन टीवी चैनलों पर यह वाक्यांश बार-बार सुनाई दे रहा था। कोई उसका अर्थ समझा रहा था, कोई उसके प्रभाव पर बात कर रहा था और कोई उसकी सीमा पर सवाल उठा रहा था। मैं टीवी के सामने बैठा यह सब सुन रहा था, लेकिन मेरा मन किसी पक्ष या विपक्ष में नहीं गया। मेरे भीतर केवल एक पुरानी जिज्ञासा जागी – क्या मैं फिर से किसी नए वाक्यांश की यात्रा की शुरुआत देख रहा हूँ?
क्या यह शब्द केवल एक भाषण तक सीमित रह जाएगा? क्या कुछ महीनों बाद लोग इसे भूल जाएंगे? क्या यह राजनीतिक भाषा का हिस्सा बनेगा? क्या इसका अर्थ आगे चलकर कुछ और हो जाएगा? आज इन सवालों का सही उत्तर किसी के पास नहीं है, और शायद अभी होना भी नहीं चाहिए।
भाषा ऐसे फैसले पहले से नहीं करती।
शायद यही बात प्रोफेसर कालिया मुझे तीस साल पहले समझा रहे थे। शब्दकोश किसी शब्द को जीवन नहीं देता। वह बहुत बाद में आता है और केवल यह दर्ज करता है कि लोग उस शब्द को कैसे बोलते रहे, कैसे लिखते रहे और कैसे उसका अर्थ बदलता गया। पहले लेखक लिखता है, चिकित्सक देखता है, विचारक सोचता है, कोई घटना घटती है और लोग किसी शब्द को अपनाना शुरू करते हैं। उसके बाद समय तय करता है कि वह शब्द आगे जाएगा या वहीं रुक जाएगा।
यह बात मुझे तब भी बहुत सुंदर लगी थी और आज भी लगती है।
भाषा कोई बंद कमरा नहीं है जहाँ हर शब्द को हमेशा के लिए एक जगह रख दिया गया हो। वह तो एक बहती हुई नदी जैसी है। पुराने शब्द उसके साथ चलते रहते हैं, नए शब्द उसमें जुड़ते रहते हैं, कुछ रास्ते में खो जाते हैं, कुछ अपना अर्थ बदल लेते हैं और कुछ इतनी दूर तक चले जाते हैं कि लोग भूल जाते हैं कि कभी वे भी नए थे।
शायद इसी में एक सुकून भी है।
हर पीढ़ी को लगता है कि उसकी भाषा बहुत तेजी से बदल रही है। नए शब्द कभी-कभी अजीब लगते हैं और नए वाक्यांशों पर बहस भी होती है। लेकिन हमसे पहले की पीढ़ियों ने भी यही देखा होगा। जो शब्द आज हमें बिल्कुल सामान्य लगते हैं, कभी वे भी नए और अनजाने रहे होंगे। भाषा बदलते-बदलते ही जीवित रहती है।
हर नया शब्द हमेशा नहीं रहता। अधिकतर बातें समय के साथ गायब हो जाती हैं। लेकिन कभी-कभी कोई शब्द या वाक्यांश लोगों के अनुभव को इतने छोटे और साफ रूप में पकड़ लेता है कि लोग उसे अपनाने लगते हैं। वह एक व्यक्ति से दूसरे तक जाता है, लिखे हुए शब्दों में आता है, पीढ़ियों तक चलता है और एक दिन इतना सामान्य हो जाता है कि कोई यह नहीं सोचता कि इसे पहली बार किसने कहा था।
उस रविवार की शाम एक छोटा-सा वाक्यांश मुझे लाल किले से लगभग तीस साल पुराने एक कमरे तक ले गया। फिर वहाँ से मैं चिकित्सकों, शरीर रचना के विद्वानों, विचारकों, लेखकों, जहाजों और इतिहास के अलग-अलग मोड़ों तक पहुँच गया। मुझे फिर याद आया कि शब्द केवल अर्थ नहीं रखते, वे अपने साथ मनुष्य की सोच, अनुभव और यादें भी लेकर चलते हैं।
शायद आने वाली पीढ़ियाँ भी कुछ ऐसे शब्द सहजता से बोलेंगी जो आज हमें नए लगते हैं। नए अनुभव नए शब्द खोजते रहेंगे और पुराने शब्दों में नए अर्थ जुड़ते रहेंगे। यही भाषा की यात्रा है, और शायद यही उसकी सुंदरता भी है।
हम देखते हैं, समझते हैं, नाम देते हैं और याद रखते हैं। समय धीरे-धीरे तय करता है कि क्या बचा रहेगा, और कभी-कभी किसी एक व्यक्ति के शब्द धीरे-धीरे पूरी भाषा की धरोहर बन जाते हैं।