हर जीवन की एक शुरुआत होती है और एक दिन उसका अंत भी आता है।
यह सच हम सब जानते हैं, लेकिन जब यह सच किसी अपने के बहुत पास आकर खड़ा हो जाता है, तब इसे स्वीकार करना आसान नहीं रहता।
उम्र बहुत आगे बढ़ चुकी होती है। शरीर इतना कमजोर और नाजुक हो जाता है कि वह फिर से पहले जैसा होने की ताकत लगभग खो चुका होता है।
यदि जीवन कुछ दिन, कुछ सप्ताह या कुछ महीने और बढ़ भी जाए, तो उन दिनों में आराम से अधिक तकलीफ, विवशता और लाचारी का डर दिखाई देता है।
और सबसे कठिन बात तब होती है जब वह व्यक्ति स्वयं यह भी नहीं समझ पा रहा हो कि उसके आसपास क्या हो रहा है।
वह अपनी इच्छा नहीं बता सकता, अपना दर्द ठीक से नहीं कह सकता, कोई निर्णय नहीं ले सकता। शायद परिचित चेहरे भी पूरी तरह पहचान में न आ रहे हों।
ऐसे समय में अपने लोगों के सामने बहुत कठिन जिम्मेदारी आ जाती है।
तब प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि जीवन को कितने दिन और बढ़ाया जा सकता है।
मन के भीतर एक दूसरा प्रश्न धीरे-धीरे जन्म लेने लगता है – जो समय बाकी है, उसे कितना शांत और सहज बनाया जा सकता है?
शायद हर परिस्थिति में कुछ और दिन की उम्मीद करना ही सही नहीं होता।
कभी ऐसा भी समय आता है जब किसी बहुत थके हुए शरीर से और संघर्ष की मांग न करना अधिक मानवीय लगता है। उसे अनावश्यक परेशानी से बचाया जाए।
कोई भी अपने किसी प्रिय व्यक्ति को खोना नहीं चाहता।
मन तो हमेशा उसे अपने पास ही रखना चाहता है।
लेकिन एक समय ऐसा भी आ सकता है जब दिल धीरे-धीरे यह स्वीकार करने लगता है कि हर यात्रा की एक मंजिल होती है।
तब शायद मन यह नहीं कहता कि अंत जल्दी आए।
मन केवल इतना कहता है – यदि जीवन की यात्रा सचमुच अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंच चुकी है, तो अब रास्ता कठिन न हो। शरीर को अधिक कष्ट न मिले। आसपास भय और भाग-दौड़ न हो।
और जब वह क्षण आए, तो वह बहुत शांति से आए।
What you have mentioned is the harsh reality of life.
I have come across a number cases, where I myself have advised the families to surrender to the real situations.
Unnecessarily prolonging years to life is more torture to the person who is already suffering.
I remember a case where a young girl aged about 13 years was confirmed case of brain dead for a month in a well known hospital in Delhi. The case was on ventilator. I had to advise the family to let her leave this world on her own. The family was from Mathura. This incident was more than 35 years back.
My view remains the same. In the terminal cases, my view is clear.
“Adding Life to years is more important than adding years to life”
I have done so in my own mother’s case.