आज सुबह, जनवरी के आखिरी दिनों की ठंड – बारिश के बाद वाली वही गीली सर्दी – ने मेरे अंदर कुछ चुपचाप सा हिला दिया। जैसे हवा ने पुराने पन्ने पलट दिए हों। मैं समय में पीछे चला गया, और अपनी क्लिनिकल यात्रा को एक अलग ही नज़र से देखने लगा – कदम दर कदम, एक ऐसी लय में, जिसे जीते हुए मैं तब समझ ही नहीं पाया था।
लगभग बाईस साल पहले मैंने गुरुग्राम के सेक्टर 15, पार्ट 2, HUDA मार्केट में अपना यह मौजूदा क्लिनिक शुरू किया था। जब मैं यह बात ज़ोर से कहता हूँ, तो खुद ही अजीब लगता है – बाईस साल इतने जल्दी कैसे बीत गए? मुझे इसकी बिल्कुल सही तारीख़ याद नहीं, क्योंकि यह बिना किसी उद्घाटन समारोह के शुरू हुआ था, बिना रिबन काटे, बिना किसी तालियों के। यह बस शुरू हो गया था – बिल्कुल वैसे ही जैसे ज़िंदगी के कई असली काम शुरू होते हैं: एक फैसला, दरवाज़े की चाबी, और फिर अगली सुबह फिर से उसी जगह पहुंच जाना।
जब मैं अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस की शुरुआत को याद करता हूँ, तो मन 1989 तक चला जाता है। ज़्यादातर नए डॉक्टरों की तरह मेरे पास भी कोई तैयार सेटअप नहीं था, न ही रेफरल की लाइन दरवाज़े पर खड़ी थी। क्लिनिक के लिए जगह ढूंढने में छह महीने लगाने के बाद, फिर जनवरी में मैंने अपना पहला क्लिनिक शुरू किया – एक रेज़िडेंस-कम-क्लिनिक। वह बहुत साधारण था, थोड़ा अनिश्चित भी, लेकिन वह मेरा था। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो हैरानी इस बात पर नहीं होती कि शुरुआत कितनी छोटी थी; हैरानी इस बात पर होती है कि उस छोटी शुरुआत के लिए भी कितनी हिम्मत चाहिए थी।
फिर साल आगे बढ़ते गए। 1996 में मैं वसंत कुंज इलाके में शिफ्ट हुआ। 1998 में मैं गुरुग्राम आ गया, और एक बार फिर जनवरी ने एक नई शुरुआत पर अपनी मुहर लगाई। जनवरी 1999 में मैंने अपना दूसरा रेज़िडेंस-कम-क्लिनिक शुरू किया। मैंने कभी इसे कोई पैटर्न नहीं माना था, लेकिन ज़िंदगी अपने कुछ दोहराव खुद बनाती है – और कई बार उन दोहरावों का मतलब तब समझ आता है, जब हम रुककर उन्हें ध्यान से देखते हैं।
और फिर आया सबसे झकझोर देने वाला दौर: 2002 से 2004। वो साल मेरे लिए उथल-पुथल के साल थे, कई वजहों से। मैं एक ऐसे प्रोजेक्ट से अलग हो रहा था जिसमें मैंने अपनी ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय और ऊर्जा झोंक दी थी। उसी दौरान कुछ मौके मेरे हाथ से निकल गए, क्योंकि मुझे उस प्रोजेक्ट के हिसाब से “बड़ा सोचना” था – और धीरे-धीरे वो “बड़ा सोचना” मुझे खोखला सा लगने लगा। उसी समय मैं जयपुर से होम्योपैथी में MD कर रहा था, जिसका मतलब था बार-बार सफर, लगातार पढ़ाई, और PG व थीसिस का निरंतर दबाव।
और जैसे यह सब कम था, मैंने अपना घर भी भारी नुकसान में बेचा – जितना मैंने उसे बनाने में खर्च किया था, उससे बीस प्रतिशत से भी ज़्यादा कम में। उस समय मेरे हाथ में कोई नौकरी नहीं थी। मैं क्लिनिक के लिए नई जगह ढूंढ रहा था, उसे बनवा रहा था, और साथ-साथ जयपुर के चक्कर भी लग रहे थे। सब कुछ एक साथ संभालना पड़ रहा था – पढ़ाई, पैसे, ज़िम्मेदारियां, और मन के अंदर की वह खामोश ज़िद कि मुझे आगे बढ़ते रहना है।
उस समय मेरी ज़िंदगी बिल्कुल ऐसी लगती थी जैसे आप किसी तांगे में बैठे हों और उसका घोड़ा अचानक बिदक जाए। घोड़ा तीन कदम आगे बढ़े, फिर दो कदम पीछे आए, एक कदम बाएं मुड़े, फिर एक कदम दाएं मुड़े – और यह तब तक चलता रहे जब तक घोड़ा थक न जाए, या उसका होशियार मालिक उसे काबू में न कर ले। यह दृश्य बहुत लोगों ने अपने बचपन में देखा होगा।
फिर जनवरी 2004 के आखिर तक मैंने यह मौजूदा क्लिनिक शुरू किया। फिर वही जनवरी। फिर वही बिना शोर-शराबे की शुरुआत। कोई बड़ी लॉन्चिंग नहीं, बस एक ज़मीन से जुड़ी हुई शुरुआत। तब से मैं यहीं हूं – उसी जगह, उन्हीं टाइमिंग्स के साथ। मैंने समझा कि जो काम शोर और प्रचार कभी-कभी नहीं कर पाते, वह काम निरंतरता कर देती है: भरोसा धीरे-धीरे बनता है, केस दर केस, साल दर साल।
कल ही एक पुराने मरीज़ का फोन आया – आठ या नौ साल बाद। उसने पूछा, “अब आप कहां मिलेंगे कंसल्टेशन के लिए?” और मेरे मुंह से लगभग अपने आप निकल गया, “वही जगह – सेक्टर 15, पार्ट 2 – वही क्लिनिक, वही टाइमिंग्स।” फोन रखने के बाद मुझे उस वाक्य का वजन महसूस हुआ: वही जगह। आज के बेचैन दौर में, “वही जगह” अपने आप में एक बयान बन गया है।
और इसी वजह से आज मैं यह सब सोच रहा हूँ। मेरा पहला क्लिनिक जनवरी में शुरू हुआ था। मेरा दूसरा रेज़िडेंस-कम-क्लिनिक जनवरी 1999 में शुरू हुआ। और यह क्लिनिक जनवरी 2004 के आखिर में शुरू हुआ। मैं इसे किस्मत नहीं कहता, लेकिन यह एक याद दिलाने वाली बात ज़रूर लगती है: शुरुआतें हमेशा जश्न बनकर नहीं आतीं। कई बार वे ठंडी सुबहों में आती हैं, अनिश्चित पैसों के बीच आती हैं, और अपने आप से किए गए उस खामोश वादे में आती हैं – कि मैं रुकूंगा नहीं।
अगर आपके घर में मेडिकल फील्ड में पहले से कोई नहीं है, और संसाधन भी सीमित हैं, तो शुरुआती साल सच में कठिन और झकझोर देने वाले हो सकते हैं। स्थिरता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। मेरे मामले में, खुद को सच में स्थिर करने में करीब बीस से तीस साल लगे – बल्कि सच कहूं तो तीस साल से भी ज्यादा। लेकिन यही बात मैं बिना मीठी परत चढ़ाए युवा डॉक्टरों तक पहुंचाना चाहता हूँ: रास्ता लंबा है, और फिर भी यह रास्ता चलने लायक है।
क्योंकि लगन सब कुछ बदल देती है। निरंतरता सब कुछ बदल देती है। सहनशक्ति और जुझारूपन सब कुछ बदल देते हैं। एक हफ्ते में नहीं, एक साल में नहीं – लेकिन यकीनन, धीरे-धीरे, मजबूती से। एक दिन आप पीछे मुड़कर देखेंगे और समझेंगे कि जो आपको धीमा लग रहा था, वही असल में आपकी गहरी नींव बन रहा था। और जब वह नींव दिखने लगती है, तो वह सिर्फ सफलता नहीं होती – वह ऐसी ताकत होती है जिसे कोई आपसे छीन नहीं सकता।
Dr Sahib.. educative lines for struggle.
With grace of Almighty; positive mindset a base for success.
Always stay blessed.
aammeeiin
Thank you, Ahmed ji. I’m glad these lines resonated. With the Almighty’s grace, a positive mindset, patience, and steady persistence truly become the foundation of success. Grateful for your blessings – Ameen.
आपके शब्दों में आपके सफर की गहरी भावनाएं झलकती हैं। आपने अपनी भावनाओं की सूक्ष्मता को जिस तरह से समझाया है, वह सराहनीय है। सर, मैं वास्तव में आपकी प्रशंसा करता हूँ।
डॉ. रोहित शर्मा जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
यह जानकर अच्छा लगा कि मेरी बातों में छुपी गहराई और अनुभव आप तक पहुंचे।
भावनाओं की सच्चाई को शब्दों में पिरोना मेरे लिए भी एक आत्ममंथन जैसा है।
आपकी सराहना मेरे लिए सम्मान है।
स्नेह सहित।
डॉ. अनिल सिंघल