आज रविवार की शाम है। कल दीवाली है। मैं अपने कमरे में शांति से बैठा हूँ और यूँ ही पुरानी यादों में चला गया हूँ। ज़िंदगी के पिछले साठ सालों की दीवालियाँ मेरी आँखों के सामने जैसे एक-एक करके जलती हुई दीयों की तरह चमक उठी हैं। कुछ तेज़ रौशनी वाली, कुछ हल्की, कुछ बहुत ही शांत।
मुझे याद नहीं कि जब मैं तीन-चार साल का था तब की दीवाली कैसी थी। उस उम्र की कोई याद मेरे दिमाग की कोशिकाओं में नहीं है। लेकिन थोड़ा बड़ा हुआ तो याद आता है कि हम छोटे-छोटे बिंदी वाले पटाखे और पिस्तौल वाली रिबन पटाखे से दीवाली मनाते थे। बड़े-बड़े पटाखों से डर लगता था, कान बंद कर लेता था या दीवार के पीछे छिप जाता था।
उस समय मिठाइयाँ भी सादी होती थीं — बर्फी, गुलाबजामुन, रसगुल्ला, बालूशाही — बस इतनी ही। न आज जैसी सैकड़ों किस्में, विदेशी नामों वाली मिठाइयाँ। पर उन सादी मिठाइयों में भी ख़ुशबू थी, सादगी थी, और असली स्वाद था।
फिर आया स्कूल का समय — रामजस स्कूल नं. 4, पहाड़गंज। उस समय की दीवाली की तो बात ही कुछ और थी। कई बार कुछ शरारती लड़के क्लास के बीच में ही छोटा पटाखा फोड़ देते थे, और पूरी क्लास हँसी से गूंज उठती थी। स्कूल के बाद मैदान में सब मिलकर पटाखे चलाते थे — कोई अनार, कोई चकरी, कोई फुलझड़ी। ना कोई तुलना, ना दिखावा, बस दोस्ती और हँसी।
थोड़ा और बड़ा हुआ तो मैंने अपने मौसी के घर अपने कज़िन्स से अनार बनाना सीखा। ये बड़ा मज़ेदार अनुभव था।
हम सब बड़ी सब्ज़ी मंडी, पहाड़गंज — पंचकुइं रोड के पीछे वाले बाज़ार से अनार बनाने का सामान लाते थे। वहाँ से धातु के बुरादे (metal scrap) भी लेते थे क्योंकि उनसे अलग-अलग रंग के चिंगारियाँ निकलती थीं — लोहा पीली, ताँबा नीली-हरी, ज़िंक सफ़ेद, और कई और रंगों की। सही मिश्रण से अनार ज़्यादा ऊँचाई तक जाता और देर तक जलता था। आस-पड़ोस के बच्चे और लोग उत्सुक रहते थे कि हम इस साल अनार बना रहे हैं या नहीं।
धीरे-धीरे मेरे दो स्कूल के दोस्त भी जुड़ गए — सुरजीत, जो आज चार्टर्ड अकाउंटेंट है, और इंदरसेन, जो आज accountancy कोच है। सुरजीत तो हर साल ज़्यादा सामान लेता था क्योंकि दीवाली के बाद गुरु नानक देव जी का पर्व आता था। पाँच-छह साल तक ये परंपरा चली — पाउडर मिलाना, अनार के खोल भरना, कागज़ लपेटना, चिंगारी देखना और रात को खुद के बनाए अनार जलाना। वो दिन ज़िंदगी की बहुत प्यारी यादें हैं।
फिर आया कॉलेज का समय — नेहरू होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, दिल्ली। मेरे दोस्त पी.डी., जो अब अमेरिका में एनेस्थीसियोलॉजिस्ट हैं, के पास मोटरबाइक थी। वो मुझे लेने आते, और हम कनॉट प्लेस, मिंटो रोड, गोल मार्केट घूमते थे। दीवाली की शाम की रौशनी में वो सैर अब भी याद है। एक बार इंटर्नशिप के दौरान हमने दीवाली डॉक्टर्स ड्यूटी रूम (DDR) में मनाई थी — ड्यूटी पर थे, मगर कुछ मोमबत्तियाँ जलाईं, मिठाई बाँटी, और चाय पर खूब बातें कीं। छोटा-सा सेलिब्रेशन था, मगर बहुत अपना था।
कॉलेज के बाद ज़िंदगी बदली। क्लिनिक शुरू किया। अब दीवाली थोड़ी औपचारिक हो गई थी। डॉक्टर बनने के बाद एक जिम्मेदारी और सामाजिक छवि भी आ गई थी। अब पटाखे नहीं, बल्कि मरीजों की दुआएँ और शुभकामनाएँ थीं। मिठाई के डिब्बे और अभिवादन बढ़ गए, लेकिन बचपन की मस्ती कहीं पीछे रह गई।
फिर शादी हुई, फिर घर बदला, और गुरुग्राम आ गया। नए पड़ोसी, नया माहौल — पर दीवाली वही पुरानी गर्मजोशी वाली रही। धीरे-धीरे ज़िंदगी स्थिर होती गई।
जब मेरी बेटी छोटी थी, तो दीवाली ने फिर से रंग भर दिए। घर में रंगोली, छोटी-छोटी फुलझड़ियाँ, मिठाइयाँ — और सबसे बड़ी बात, उसकी आँखों में वो चमक जो पूरे घर को रोशन कर देती थी। उसकी हँसी में मेरा बचपन फिर से लौट आता था।
समय के साथ-साथ त्योहारों की रौनक बदलती गई। अब दीवाली में उतनी हलचल नहीं होती। अब ज़्यादातर लोग मोबाइल से संदेश भेजते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं। पहले की तरह मिलने-जुलने की जगह अब स्क्रीन ले ली है। अब “Happy Diwali” का मैसेज पलक झपकते ही पहुँच जाता है, पर उसकी गर्मी, उसका स्पर्श जैसे थोड़ा कम हो गया है।
हर दीवाली रोशनी नहीं लाई। कोविड-19 महामारी के दौरान तो खुद हम सब बीमार थे — बुखार, कमजोरी, और बाहर से आती दीपों की हल्की रौशनी। एक दीवाली ऐसी भी आई जब हमें एक दूर के रिश्तेदार की श्मशान यात्रा में जाना पड़ा। उस दिन लगा कि दीवाली केवल दीयों की नहीं, जीवन की नश्वरता की भी याद दिलाती है।
पर हर बार अँधेरी दीवाली के बाद एक और दीवाली आई — नई उम्मीद के साथ। शायद यही जीवन का चक्र है — रोशनी और अँधेरा, दोनों साथ चलते हैं।
आज जब मैं अपने कमरे में बैठा हूँ, तो महसूस करता हूँ कि दीवाली दरअसल मेरी ज़िंदगी का आईना रही है। बचपन की मासूमियत, जवानी की ऊर्जा, प्रोफेशनल जिम्मेदारी, पारिवारिक अपनापन और अब आत्म-मंथन — हर दौर की अपनी एक दीवाली रही है। अब मैं तेज़ आवाज़ वाले पटाखों से नहीं, एक शांत दीये की लौ से सुकून पाता हूँ। यही दीवाली का असली अर्थ है — बाहर की नहीं, भीतर की रौशनी जलाना।
बाहर बालकनी में लाइटें झिलमिला रही हैं, बच्चे हँसते-भागते दिख रहे हैं, परिवार बाज़ारों में मिठाई ले रहे हैं — पर मेरे अंदर की सबसे सुंदर दीवाली वो है जो यादों में जल रही है। दोस्तों की हँसी, बेटी की मुस्कान, मरीजों की राहत, और वो सन्नाटा जिसमें बस दीये की लौ हिल रही होती है।
दीवाली बदल गई है — पटाखों की आवाज़ से लेकर मोबाइल के मैसेज तक — पर उसकी आत्मा वैसी ही है। ये त्योहार अब भी हमें याद दिलाता है कि हर अँधेरे के बाद रोशनी होती है, हर थकान के बाद सुकून होता है, और हर दर्द के बाद मुस्कान।
आज मैं आपसे, अपने पाठक से, दिल से कहना चाहता हूँ — जहाँ भी आप हैं, अपनी ज़िंदगी का एक छोटा-सा दीया ज़रूर जलाइए। वो दीया जो घर में नहीं, दिल में जलता है। वो दीया जो उम्मीद देता है, और याद दिलाता है कि हम सबके भीतर एक रौशनी है।
आपको मेरी तरफ़ से दिल से शुभकामनाएँ — स्वास्थ्य, सुख और शांति से भरी दीवाली की मंगलकामनाएँ।
मेरे घर से, मेरे दिल से — आपके घर तक, दीपों की रौशनी पहुँचे।
हैप्पी दीवाली।