आज रविवार की शाम है।
क्लिनिक बंद है, कोई कॉल नहीं, कोई मीटिंग नहीं, न कोई पारिवारिक या सामाजिक प्रोग्राम।
मैं अपने कमरे में अकेला बैठा हूँ – बस एक सन्नाटा है, और वही सन्नाटा जैसे मुझे अपने पास बुला रहा है।
ऐसे ही कुछ शांत पलों में, जब सब रुक जाता है, तब अपने आप से मिलने का मौका मिलता है।
आज अचानक मेरे मन में एक खयाल आया – क्या ज़िंदगी सच में जालों से भरी है… क्या सब कुछ एक ट्रैप है?
जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है – पहला ट्रैप तो बचपन में ही शुरू हो गया था।
स्कूलिंग।
शुरू में सब अच्छा लगता था – अक्षर सीखना, गिनती, कविताएँ, रंग।
पर धीरे-धीरे उसके आस-पास दीवारें बनने लगीं – टाइमटेबल, परीक्षा, नंबर, तुलना, उम्मीदें।
सीखने की खुशी धीरे-धीरे “अच्छे मार्क्स लाने” की मजबूरी में बदल गई।
ज्ञान से ज़्यादा मंज़ूरी ज़रूरी हो गई।
और शायद वहीं से मैंने पहली बार सीखा – कि प्यार और तारीफ़, दोनों शर्तों के साथ मिलते हैं।
फिर कॉलेज आया।
सोचा अब आज़ादी मिलेगी – पर यहाँ भी एक नया जाल था।
अब नंबर नहीं, पहचान का खेल शुरू हुआ – कौन आगे बढ़ेगा, कौन सबसे ज़्यादा चमकेगा।
दोस्तियाँ भी अब प्रतियोगिता में बदलने लगीं।
मैं समझ नहीं पाया, पर मैं धीरे-धीरे दूसरों से तुलना करने लगा।
एक नया ट्रैप बन गया – कंपैरिज़न का ट्रैप।
फिर प्रोफेशनल लाइफ शुरू हुई।
अब मैं स्वतंत्र था – अपना क्लिनिक, अपनी पहचान, अपनी मेहनत।
पर अब ये आज़ादी ही नई ज़िम्मेदारियों की ज़ंजीर बन गई।
मरीज़ों का भरोसा, समाज की उम्मीदें, नाम और प्रतिष्ठा की रक्षा – सब मेरे चारों ओर जैसे अदृश्य दीवारें बन गईं।
मेरी पहचान अब मेरी पेशेवर सफलता से जुड़ गई थी।
लोगों ने मुझे वैसे ही परिभाषित किया, और धीरे-धीरे मैं खुद को भी उसी नजर से देखने लगा।
बाहर से यह सफलता थी, पर भीतर से जैसे मैं अपने ही बनाए पिंजरे में था।
फिर आए पुरस्कार, प्रमाणपत्र, सम्मान।
हर एक खुशी देता था, पर थोड़ी देर के लिए।
फिर तुरंत अगला लक्ष्य सामने – एक और अवॉर्ड, एक और पहचान।
धीरे-धीरे वो आनंद भी एक आदत बन गया।
कई बार लगता था – क्या मैं काम कर रहा हूँ, या सिर्फ़ तारीफ़ों के पीछे भाग रहा हूँ?
अब तो दुनिया भर में यही नज़ारा है – लोग प्रमाणपत्रों, मेडल्स, पोस्ट्स और पब्लिसिटी के पीछे भाग रहे हैं।
शायद इसे “प्रगति” कहा जाता है, पर कहीं न कहीं यह “भय” भी है – भुला दिए जाने का भय।
आज शाम जब मैं अकेला बैठा था, तो लगा कि मैं ज़िंदगी के एक ट्रैप से दूसरे ट्रैप में गुज़रता गया।
स्कूल, कॉलेज, करियर, नाम, शोहरत – सबने मुझे गढ़ा भी और बाँधा भी।
गलत कुछ नहीं था – पर इन सबके बीच कहीं वो असली चीज़ छूट गई – स्वतंत्रता।
वो आज़ादी जो बिना किसी प्रमाणपत्र के मिलती है, बिना किसी मंच या तालियों के महसूस होती है।
बस होने की आज़ादी।
अब सोचता हूँ, शायद ज़िंदगी ऐसे ही बनी है।
शायद ये ट्रैप्स सज़ा नहीं, शिक्षक हैं।
ये हमें अनुशासन सिखाते हैं, पर साथ ही जागरूक भी करते हैं – अगर हम देख पाएं।
मुसीबत तब शुरू होती है जब हम भूल जाते हैं कि हम किसी जाल में हैं।
हम अपने पिंजरे को सजाने लगते हैं, उसे सफलता का नाम दे देते हैं, और कहते हैं – “मैं खुश हूँ।”
पर असल में हम उस पिंजरे को ही अपनी पहचान बना लेते हैं।
मेरी ज़िंदगी के हर ट्रैप के दो चेहरे थे –
स्कूलिंग ने अनुशासन दिया, पर सहजता छीन ली।
करियर ने सम्मान दिया, पर चैन ले लिया।
सम्मान ने आवाज़ दी, पर चुप रहने का डर भी दिया।
और धीरे-धीरे मुझे समझ आया – असली चाबी बस जागरूकता में है।
जब मैं ट्रैप को देख लेता हूँ, तो उसका असर कम होने लगता है।
जब मैं दूसरों से तुलना छोड़ता हूँ, तब जीवन फिर से मुझसे बात करता है।
अब लगता है असली आज़ादी ट्रैप से भागने में नहीं, बल्कि उसे समझकर उसके बीच सचेत होकर जीने में है।
काम करो, पर काम के गुलाम मत बनो।
सफलता का आनंद लो, पर उसकी भूख मत पालो।
कमाओ, सीखो, दूसरों की मदद करो – पर खुद को मत खो दो।
शायद यही असली स्वतंत्रता है – हर दीवार के ऊपर का आसमान देख पाना।
वो आसमान हमेशा वहीं था – बस हम नीचे झुककर दौड़ते रहे।
आज जब ये सब सोचता हूँ, तो मन में कोई पछतावा नहीं, बस कृतज्ञता है।
इन ट्रैप्स ने ही मुझे सिखाया कि मैं कौन हूँ, और मैं क्या बन गया।
और शायद यही समझ आज़ादी की शुरुआत है – ज़िंदगी से भागने की नहीं, बल्कि ज़िंदगी में लौटने की।
और जो भी ये पढ़ रहा है, उससे मैं यही कहना चाहता हूँ – अपने ट्रैप्स को जल्दी पहचानो।
वो खूबसूरत चेहरों में छिपे होते हैं – ambition, duty, admiration, love – पर पहचान लो, बस इतना ही काफी है।
तोड़ने की ज़रूरत नहीं, बस देख लो, जान लो, और सचेत होकर जियो।
क्योंकि जिस पल तुम किसी ट्रैप को पहचान लेते हो,
उसी पल वो ट्रैप रहना बंद कर देता है।
और वही पल, ज़िंदगी का सबसे आज़ाद पल बन जाता है।