“जब आख़िरी पंख गिरता है,
और बाँधने वाला कोई धागा नहीं बचता,
तो आत्मा, हल्की होकर, लौटना भूल जाती है।“
ज़िंदगी में कुछ पल ऐसे आते हैं जब दुनिया जैसे थोड़ी धीमी हो जाती है — ये नहीं कि वक़्त की रफ़्तार बदलती है, पर हमारे अंदर कुछ ऐसा होता है जो और गहराई से सुनने लगता है। ऐसे पलों में, हमारी उपलब्धियों की चिंता, रोज़मर्रा की दौड़, या अगली बड़ी चीज़ की चाह — सब धीरे-धीरे पीछे हट जाती है। और सामने कुछ ऐसा आता है जो चुप होता है, लेकिन बहुत गहरा। ऐसे वक़्त में ज़िंदगी किसी मक़सद या घटना की कड़ी नहीं लगती — वो बन जाती है कुछ मुलाक़ातों की एक श्रृंखला। हर मुलाक़ात — हर आत्मा, हर ख़ामोशी, हर दुख — एक गुरु बन जाती है।